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Friday, December 26, 2008

बिंदी पर लगी पाबंदी अब हटा

nurse


दक्षिण अफ्रीका में भारतीय नर्सों ने बिंदी, मंगलसूत्र और नथ पहनने की लड़ाई जीत ली है। दक्षिण अफ्रीका के अस्पतालों में काम करने वाली हिंदू महिलाओं को किसी तरह का धार्मिक चिन्ह पहनने से रोक दिया गया था जिसका उन्होंने पुरजोर विरोध किया था। क्वाजुलु नाटाल प्रांत की स्वास्थ्य मंत्री पेगी कोनेनी ने घोषणा की है कि "विवाहित हिंदू महिलाएँ ड्यूटी के दौरान भी मंगलसूत्र, नथ पहनने और बिंदी लगाने के लिए स्वतंत्र हैं।"
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, "बिंदी हिंदू महिला के शादीशुदा होने का प्रतीक है जिसका हम सम्मान करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे शादी की अंगूठी को जिस तरह मान्यता हासिल है वैसे ही हिंदू महिलाओं की बिंदी को भी होनी चाहिए।" सबसे पहले सरकारी एडिंगनटन अस्पताल ने नर्सों को ड्यूटी के दौरान बिंदी, मंगलसूत्र और नथ पहनने से रोक दिया था। मामले ने तूल पकड़ा, नर्सों ने इसका विरोध किया और फिर स्वास्थ्य मंत्री को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। इस फैसले को लागू करने वालों का कहना था कि ऐसा करने का मकसद संक्रमण को रोकना था। इस निर्णय के बाद अफ्रीकी तमिल फेडरेशन और दक्षिण अफ्रीकी हिंदू सभा जैसे संगठनों ने इस मुद्दे पर बड़ा अभियान चलाया था। तमिल फेडरेशन ने इस कदम को 'हिंदू धर्म का मजाक और अपमान' बताया था। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि कोई भी सरकारी विभाग किसी धर्म विशेष के व्यक्तियों के लिए अलग मानदंड लागू नहीं कर सकता। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, "जब महिलाएँ अपने पूरे चेहरे पर पाउडर और लिपस्टिक लगाती हैं तो हमें कोई एतराज नहीं होता लेकिन एक छोटी सी बिंदी पर आपत्ति होती है, यह कहीं से न्यायसंगत नहीं था।" दक्षिण अफ्रीका के हिंदू संगठनों और भारतीय मूल की नर्सों ने इस फैसले का स्वागत किया है।

Friday, December 19, 2008

खेती में भी ठिठुरन पैदा कर रही ठंड

कोहरा और बदली से खेती भी 'ठिठुर' रही है। तापमान में गिरावट से एक तरफ जहां पछैती गेहूं के जमाव में कठिनाई हो रही है, वहीं सरसों, तोरिया, अरहर व आलू की फसलों पर खतरनाक कीट मंडराने लगे हैं।कृषि वैज्ञानिक आशंका जता रहे हैं कि सूर्यदेव यदि चार-छह दिन इसी तरह बादलों में छिपे रहे तो रबी की फसलों के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।नरेन्द्रदेव कृषि विवि, फैजाबाद के कृषि मौसम विज्ञान विभागाध्यक्ष डा.पद्माकर त्रिपाठी का कहना है कि जिन फसलों में फूल निकल रहे हैं, उनके लिए यह मौसम खतरनाक है। इस दृष्टि से सरसों, तोरिया व अरहर खास तौर पर मौजूदा मौसम के निशाने पर हैं।डा. त्रिपाठी ने बताया कि पिछले दो-तीन दिनों से धूप नहीं निकल रही, और आ‌र्द्रता 96-98 फीसदी है। यह परिस्थिति सरसों व तोरिया में माहू व आरा मक्खी तथा अरहर में लीफ वेबर व फलबेधक कीटों के लिए बेहद मुफीद है। वैसे भी जब कोहरा व बदली रहती है, फसल में फूलों की तादात व वृद्धि घट जाती है। डा. त्रिपाठी आगाह करते हैं कि मौजूदा परिस्थिति यदि अगले कई दिन इसी तरह जारी रहती है, और धूप नहीं निकलती है तो किसानों को अपने अनुभव व स्थानीय कृषि अधिकारियों की सलाह से बचाव के कदम उठाने चाहिए।जहां तक गेहूं का सवाल है, ठंड बढ़ने से फसल पर तो कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन जिन पछैती प्रजातियों की बोवाई 15 दिसंबर से शुरू हुई, उनके जमाव में निश्चित रूप में ज्यादा वक्त लगेगा। डा. त्रिपाठी ने बताया कि शुक्रवार को दिन का तापमान 16.5 डिग्री सेन्टीग्रेड रहा, जो सामान्य से 6.5 डिग्री कम है, जबकि रात का तापमान 9-10 डिग्री है, जो सामान्य से थोड़ा ज्यादा है। डा. त्रिपाठी के मुताबिक, तापमान की यह विचित्रता किसी भी तरह फसल के लिए लाभदायी नहीं है।उन्होंने बताया कि आलू किसानों को इस मौसम में झुलसा रोग को लेकर सचेत रहना चाहिए, क्योंकि इस रोग के लिए मौजूदा मौसम पूरी तरह मुफीद है। उन्होंने बताया कि राजस्थान के ऊपर एक सिस्टम विकसित हो रहा है, जिसकी वजह से दो-तीन दिन में प्रदेश में हल्की-फुल्की बारिश हो सकती है।

Wednesday, December 3, 2008

विवाह के लिए 209 पुरुषों का अपहरण

सुनने में भले ही यह अजीबोगरीब लगे, लेकिन सच बात यह है कि ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में पिछले साल जबरदस्ती विवाह कराने के लिए 209 पुरुषों का अपहरण किया गया। इसमें तीन पुरुष ऐसे भी हैं जिनकी उम्र 50 वर्ष से अधिक थी, जबकि दो की उम्र दस साल से भी कम थी।राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी भारत में अपराध 2007 रिपोर्ट के अनुसार मजे की बात है कि बिहार एकमात्र ऐसा राज्य है जहां महिलाओं की तुलना में पुरुषों का अधिक अपहरण होता है। इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 1268 पुरुषों का अपहरण किया गया था जबकि महिलाओं की संख्या इस आंकड़े से छह कम थी।अपहरण के 27561 मामलों में से 12856 मामले विवाह से संबंधित थे। महिलाओं के अपहरण के पीछे सबसे बड़ा कारण विवाह है। महिलाओं के कुल 20690 मामलों में से 12655 मामले [61.2 प्रतिशत] के पीछे विवाह ही एकमात्र कारण था, जबकि पुरुषों के अपहरण के कुल 7342 मामलों में 596 [8.1 प्रतिशत] में फिरौती मुख्य कारण था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अपहृत युवतियों की सर्वाधिक संख्या 18 से 30 वर्ष की उम्र के बीच है। इस आयु वर्ग की 7930 महिलाओं का अपहरण हुआ। जबकि 15 से 18 वर्ष के बीच अपहृत महिलाओं की संख्या 264 थी।

उधर, अपहृत हुए 417 में से 18 से 30 वर्ष की आयु वर्ग के पांच पुरुष ऐसे थे, जिन्हें वेश्यावृत्ति के लिए अपहृत किया गया था। जबकि इसी उद्देश्य के लिए अपहृत की गई इस आयु वर्ग की महिलाओं की संख्या 264 थी।पिछले साल कुल 28030 लोगों का अपहरण किया गया। इससे पिछले वर्ष की तुलना में अपहरण के मामलों में 15.4 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों [7340] के मुकाबले दोगुनी संख्या में महिलाओं [20690] के अपहरण के मामले दर्ज किए गए।रिपोर्ट के अनुसार ऐसा एक भी मामला नहीं है जहां शरीर या शरीर के अंगों को बेचने के लिए अपहरण का मामला दर्ज किया गया हो, जबकि भीख मांगने के लिए मजबूर करने वाले लोगों द्वारा अपहरण के 15 मामले दर्ज किए गए।अपहरण के सबसे ज्यादा मामले [4478] उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए जो कुल संख्या का 16.2 प्रतिशत है। इसके बाद बिहार [2530] का स्थान है।

Monday, November 24, 2008

छोटे भाई की पत्नी से दुष्कर्म

दहेज की मांग पूरी न होने पर एक व्यक्ति ने रिश्तों को तार-तार करते हुए अपने छोटे भाई की पत्नी को बंधक बनाकर उसके साथ चार-पांच दिन तक दुष्कर्म किया। महिला ने किसी तरह इसकी सूचना अपने मायके वालों को दी। मायके वालों ने सोमवार को उसे ससुरालियों के चंगुल से मुक्त कराया। पीड़ित का पिता जब मामले की शिकायत करने थाने पहुंचा, तो पुलिस ने उल्टे उसे ही हवालात में बंद करने की धमकी देकर भगा दिया। बाद में मामला आला अफसरों के संज्ञान में आने के बाद तहरीर ली गई।बिसरख थाना क्षेत्र के हबीबपुर गांव निवासी जयराम जाटव के बेटे राधेश्याम की करीब ढाई साल पहले निलोनी शाहपुर गांव के भीखा की बेटी से शादी हुई थी। पीड़ित के पिता का आरोप है कि राधेश्याम और उसके परिवार वाले दहेज के लिए उनकी बेटी को लगातार प्रताड़ित कर रहे थे। शादी में पल्सर मोटरसाइकिल समेत काफी सामान दिया गया था, लेकिन ससुराल वाले इससे भी खुश नहीं हुए। बाद में ससुराल वाले मारुति कार व पांच लाख रुपये की मांग करने लगे। बीते 16 नवंबर को राधेश्याम और उसके घर वाले निलोनी शाहपुर पहुंचे और मिन्नत करके महिला को हबीबपुर ले आए। महिला के पिता का आरोप है कि दहेज न देने पर राधेश्याम के घर वालों ने उनकी बेटी को बंधक बना लिया और उसके जेठ राजाराम ने उसके साथ चार-पांच दिन तक दुष्कर्म किया। सोमवार को किसी तरह उनकी बेटी ने फोन पर अपनी मां को पूरी बात बताई। इसके बाद वह हबीबपुर पहुंचे और ससुराल वालों के चंगुल से बेटी को मुक्त कराया। जब वह बिसरख थाने पहुंचे, तो थानाध्यक्ष ने मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया। उनका आरोप है कि पुलिस ने उन्हें धमकी दी कि वह मामले की शिकायत किसी ओर से करेगा तो उसे हवालात में बंद कर दिया जाएगा।सीओ राजेश कुमार सिंह ने कहा कि मामले की तहरीर ले ली गई है और जांच के लिए पुलिस को गांव में भेज दिया गया है। जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

Tuesday, November 4, 2008

सस्ता होगा कर्ज

सार्वजनिक बैंक हो गए तैयार, रियल एस्टेट और छोटे-मझोले उद्योगों पर भी होगी सरकार की नजर-ए-इनायत
देश के सार्वजनिक बैंक ब्याज दरों में कटौती की सरकार की अपील पर विचार करने को तैयार हो गए हैं।

एक बैठक में सार्वजनिक बैंकों के प्रमुखों ने वित्त मंत्री को इस बाबत आश्वासन भी दे दिया है। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बैठक के बाद यह जानकारी दी। इस मौके पर चिदंबरम ने रियल एस्टेट और छोटे एवं मझोले उद्योगों (एसएमई) को पर्याप्त नकदी मुहैया कराने का वादा भी किया। उन्होंने बताया कि आरबीआई जल्दी ही नेशनल हाउसिंग बैंक की क्रेडिट लाइन का विस्तार कर इसे 10,000 करोड़ रुपये करेगा ताकि आवास क्षेत्र में पर्याप्त फंड उपलब्ध रहे। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने नकदी और कर्ज की स्थिति की समीक्षा के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुख कार्यकारियों के साथ यह बैठक बुलाई थी। बैठक में एसबीआई के अध्यक्ष ओ.पी. भट्ट, पीएनबी के प्रमुख के.सी.चक्रवर्ती, बैंक ऑफ बड़ौदा के अध्यक्ष एम.डी. माल्या, केनरा बैंक के प्रमुख ए.सी. महाजन, यूको बैंक के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक एस.के. गोयल आदि ने हिस्सा लिया। इनके अलावा वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के उच्चाधिकारी भी इसमें शामिल थे। यह बैठक भारत के प्रमुख उद्योगपतियों की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात के एक दिन बाद हुई। इस बैठक में उद्योगपतियों ने नकदी बढ़ाने और ब्याज दरों में कटौती के लिए माहौल तैयार करने के लिए कदम उठाने की मांग की थी। बैंकर्स के साथ हुई बैठक की जानकारी देते हुए वित्त मंत्री ने बताया कि ऋण की मांग अधिक है और बैंकर दबाव महसूस कर रहे हैं। निजी और विदेशी बैंकों द्वारा भी कर्ज दरों में कटौती के मसले पर चिदंबरम ने कहा कि वित्त सचिव अरुण रामनाथन ने इस पर बातचीत के लिए बैठक बुलाई है।
यूको और सिंडीकेट बैंक ने की कटौती:-पंजाब नेशनल बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के बाद यूको और सिंडिकेट बैंक ने भी अब ब्याज दरों में कटौती का ऐलान कर दिया है। यूको बैंक ने कहा कि वह अगले हफ्ते प्रधान ऋण दरों (पीएलआर) में 50 आधार अंकों की कटौती करेगा। जबकि सिंडीकेट बैंक ने अपनी प्रमुख उधारी दर में 75 आधार अंकों की कटौती करके इसे 13.25 प्रतिशत सालाना कर दिया है। यह कटौती मंगलवार से ही प्रभावी होगी।
स्टेट बैंक भी कतार में:-देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने मंगलवार को कहा कि वह बुधवार को अपनी बेंचमार्क प्रधान ऋण दरों (पीएलआर) में 50 आधार अंकों तक की कटौती कर सकता है। एसबीआई के अध्यक्ष ओ.पी.भट्ट ने यहां वित्त मंत्री के साथ बैठक के बाद यह जानकारी दी। दरों में प्रस्तावित कटौती अगले सप्ताह से प्रभावी होगी। भट्ट ने पहले कहा था कि ब्याज दर चरम पर पहुंच गई है और उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में इसमें कमी आएगी। भट्ट ने कहा- हमारी एल्को (परिसंपत्ति एवं देनदारी समिति) की बैठक बुधवार को होनी चाहिए और इसमें ही कटौती का निर्णय होने की उम्मीद है।

...इसी घी से मिटेगी मंदी की सुस्ती:-कार, आवास एवं अन्य व्यावसायिक उत्पादों के लिए ऋण सस्ता हो सकता है। पीएलआर में हो रही ये कटौतियां बेहद अहम हैं। क्योंकि सभी बैंकों द्वारा दिए जाने वाले सभी किस्म के ऋण बेंचमार्क दरों से जुड़े हैं और पीएलआर में बढ़ोतरी या कटौती के साथ बढ़ते-घटते हैं।जाहिर है, इसके चलते बाजार में नकदी का प्रवाह भी तेजी से बढ़ेगा, जिससे मंदी से मंद हो रहे औद्योगिक उत्पादन और अन्य कारोबारी क्षेत्रों को फिर से रफ्तार मिल सकेगी।

...बाजार में तो ऐलान भर से ही आ गई चुस्ती-फुर्ती:-वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद जाहिर करने से शेयर बाजार में अच्छी तेजी देखी गई। इससे पहले बंबई स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी, दोनों गिरावट पर खुले थे और ऊपरी स्तरों पर मुनाफावसूली भी देखी गई, लेकिन वित्त मंत्री के बयान के बाद बाजार में तेजी आनी शुरू हुई।
कारोबार समाप्ति पर सेंसेक्स 293.44 अंक ऊपर 10,631.12 के स्तर पर, जबकि निफ्टी 98.25 अंक ऊपर 3142.10 के स्तर पर बंद हुआ। सेंसेक्स में सबसे ज्यादा करीब 14 फीसदी का उछाल रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ के शेयरों में देखा गया।

शिमला में बस खड्‍ड में गिरी, 45 मरे

शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कुफरी के नजदीक मंगलवार को एक निजी बस के 200 मीटर गहरे खड्ड में गिर जाने से 45 यात्रियों की मौत हो गई और पाँच अन्य घायल हो गए।
पुलिस अधीक्षक राजेंद्र मोहन शर्मा ने बताया कि 44 यात्रियों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, जबकि एक अन्य ने शिमला स्थित इंदिरा गाँधी मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ दिया। उन्होंने कहा कि मरने वालों में बहुत सी महिलाएँ भी शामिल हैं, लेकिन वह तत्काल महिलाओं और बच्चों की संख्या नहीं बता पाए। पाँच घायल लोग इंदिरा गाँधी मेडिकल कालेज में भर्ती हैं। शर्मा ने बताया कि हादसा सुबह लगभग 11 बजे उस समय हुआ जब बस रामपुर उपमंडल के कोठी घाट से शिमला जा रही थी।रामपुर शिमला रोड पर कुफरी से लगभग पाँच किलोमीटर दूर लांबी धर के नजदीक यह बस खड्ड में जा गिरी। हादसे में बस पूरी तरह नष्ट हो गई है।घटना की सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक के अतिरिक्त शिमला के उपायुक्त जेएस राणा और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मोहिन्दरसिंह घटनाथल पर राहत एवं बचाव कार्यों के निरीक्षण के लिए पहुँच गए।

Monday, November 3, 2008

उत्तर प्रदेश में उर्वरक की कमी के लिए रामविलास पासवान जिम्मेदारः बसपा

लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तथा सहकारिता मंत्री श्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने प्रदेश में रासायनिक खाद की कमी के बारे में मीडिया में दिये जा रहे कांग्रेस पार्टी तथा समाजवादी पार्टी के नेताओं के बयानों के लिए दोनों दलों के नेताओं को आड़े हाथों लिया है और प्रदेश में उर्वरक की कमी के लिए केन्द्र सरकार तथा उसके उर्वरक मंत्री श्री राम विलास पासवान को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने इस मामले में सपा के रवैये को शर्मनाक बताया है।

श्री मौर्य ने कहा है कि प्रदेश सरकार द्वारा इस वर्ष रबी के लिए केन्द्र से 14 लाख मीट्रिक टन डीएपी की मांग की गयी थी, लेकिन केन्द्र सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश के प्रति अपनी पुरानी भेदभाव की नीति अपनाते हुए केवल 10.50 लाख मी0 टन खाद देने का आश्वासन दिया गया था। उन्होंने कहा कि इस आश्वासन के बावजूद केन्द्र सरकार द्वारा प्रदेश हेतु अक्टूबर माह के लिए आवंटित कोटा भी अभी तक पूरा नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि अक्टूबर माह में शेष रह गयी 40 हजार मी0 टन खाद अभी तक उपलब्ध न कराये जाने के फलस्वरूप प्रदेश के किसानों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी और केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार को समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा इस मुद्दे पर मीडिया में दिये जा रहे बयानों से यह सिध्द होता है कि ये दोनों पार्टियां प्रदेश की जनता व किसानों के बीच भ्रम पैदा करके अपनी कमी का ठीकरा प्रदेश सरकार के सिर पर फोड़ने का प्रयास कर रही हैं।

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में चल रही केन्द्र की यूपीए की सरकार तथा उसे समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी, दोनों ही किसानों की कितनी हितैषी हैं, इसे पूरे देश का किसान अच्छी तरह जान और पहचान चुका है, इसलिए इन पार्टियों के नेताओं द्वारा दिये जा रहे उल्टे-सीधे बयानों का उस पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण ही पूरे देश में किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं करने के लिए मजबूर हो रहे हैं, जिसकी शुरूआत कांग्रेस शासित अथवा कांग्रेस पार्टी द्वारा समर्थित राज्य सरकारों के कार्यकाल में ही हुई थी और आज भी इन्हीं राज्यों में आत्महत्याएं करने वाले किसानों की तादाद सबसे ज्यादा है, जिससे पूरी तरह साफ है कि किसानों के प्रति कांग्रेस पार्टी की संवेदनशीलता महज ड्रामेबाजी है और कांग्रेस को किसानों के हित से कोई लेना-देना नहीं है।

सहकारिता मंत्री ने कहा कि इस वर्ष मानसून की अच्छी वर्षा के कारण प्रदेश के रबी के बुआई क्षेत्र में वृध्दि हुई है, जिसे देखते हुए प्रदेश सरकार ने केन्द्र से अधिक उर्वरक उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था, किन्तु केन्द्र सरकार ने इस अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर भी पूर्व की भांति उत्तर प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार करना जारी रखा और इस बात की कोई परवाह नहीं की कि उसकी इस नीति से प्रदेश के किसानों को कितना नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में इस समय रबी की बुआई का सीजन चरम पर है और ऐसे में किसानों को पर्याप्त खाद उपलब्ध नहीं कराई गयी, तो जाहिर है कि खाद्यान्न उत्पादन पर इसका काफी बुरा असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि किसान इसे अच्छी तरह समझ चुका है कि कांग्रेस तथा उसे समर्थन देने वाली पार्टियां उसकी बिल्कुल भी हितैषी नहीं हैं और इन पार्टियों के नेता ठोस मुद्दों के अभाव में अपनी बेरोजगारी का दर्द छुपाने के लिए किसी भी मुद्दे पर ओछी बयानबाजी करके प्रदेश की बसपा सरकार की छवि धूमिल करने के कुत्सित प्रयास में लगे रहते हैं।

श्री मौर्य ने कहा कि अपने को प्रदेश के किसानों की सबसे बड़ी चैम्पियन घोषित करने वाली समाजवादी पार्टी का रवैया तो इस मामले में और भी ज्यादा शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि अगर सपा प्रदेश के किसानों की जरा भी शुभचिंतक होती, तो किसानों के लिए उर्वरक की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए उसने केन्द्र की यूपीए सरकार पर दबाव बनाया होता, जबकि इसकी बजाय सपा के नेता जुबानी जमाखर्च से ही काम चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज पूरे प्रदेश के किसान यह जान चुके हैं कि सपा नेताओं ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र की यूपीए सरकार पर इस मुद्दे को लेकर कोई दबाव बनाने का प्रयास नहीं किया है। उन्होंने आगे कहा कि इसके स्थान पर किसानों के हित का दम भरने वाली समाजवादी पार्टी, केन्द्र की किसान विरोधी सरकार को समर्थन देकर उसे जिन्दा रखे हुए है। उन्होंने सपा और उसके नेताओं को यह सलाह भी दी कि उन्हें अगर प्रदेश के किसान की वास्तव में चिन्ता है, तो किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली केन्द्र की यूपीए सरकार से तत्काल अपना समर्थन वापस लें और भ्रम पैदा करने वाली झूठी बयानबाजी करने के स्थान पर किसान विरोधी नीतियों में परिवर्तन हेतु केन्द्र की सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के नेतृत्व वाली प्रदेश की वर्तमान बसपा सरकार के साथ सहयोग करें, ताकि किसानों के बीच सपा का पूरी तरह खो चुका जनाधार उसे कुछ हद तक फिर से हासिल हो सके।

पर्यावरण और छठ पर्व में गहरा संबंध

आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण तथा पर्यावरण संरक्षण की समस्या से जूझ रहा है, सूर्य की उपासना का महापर्व छठ का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, बल्कि ऊर्जा के अक्षय स्रोत सूर्य की पूजा और उन्हें अप्रसंस्कृत वस्तुओं का भोग लगाया जाना पर्यावरण के प्रति इस पर्व के महत्व को रेखांकित करता है। सोनपुर के गजेन्द्र मोक्ष नौलख्खा मंदिर महंत आचार्य लक्ष्मणानंद शास्त्री के अनुसार पर्यावरण संरक्षण और छठ पूजा के बीच गहरा संबंध है। छठ पूजा में प्रसाद के रूप में नई फसलों का उपयोग किया जाता है।
उन्होंने कहा गन्ना, सिंघाड़ा, नींबू, हल्दी, अदरख, नारियल, केला, संतरा, सेब के अलावा आटा चीनी एवं घी के मिश्रण से बनी ठेकुआँ जैसी वस्तुएँ प्रकृति के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के इस पर्व के महत्व को स्पष्ट करती हैं। शास्त्री ने कहा छठ पूजा में मिट्टी के बने हाथी चढ़ाए जाते हैं, जो इस पर्व के माध्यम से प्रकृति प्रदत्त इस अद्भुत जीव के संरक्षण का संदेश देती है। मिट्टी के बने हाथी को नई तैयार धान की फसल चढ़ाई जाती है।सूर्य की उपासना के महापर्व छठ की शुरुआत 'नहा खा' से होती है। इस दिन व्रती नदी के स्वच्छ जल में स्नान करने के बाद मिट्टी के बने चूल्हे में आम की सूखी लकड़ी जला कर पारंपरिक रूप से सात्विक शाकाहारी भोजन तैयार करते हैं और भगवान सूर्य की पूजा के बाद इसे ग्रहण करते हैं। खरना के दिन शाम को सूर्य की पूजा के बाद प्रसाद खाकर व्रती 36 घंटे के उपवास की शुरुआत करते हैं।
छठपूजा मुख्य रूप से महिलाएँ करती हैं, लेकिन काफी संख्या में पुरुष भी इन दिनों उपवास रखते हैं। परना को सुबह के अर्घ्य के साथ छठ पूजा सम्पन्न हो जाती है। शास्त्री ने कहा छठ एक अद्भुत पर्व है, जिसमें डूबते हुए सूर्य की उपासना के साथ पूजा की शुरुआत की जाती है। उन्होंने कहा छठ छह अंक का प्रतीक है, जिसका भारतीय धार्मिक पंचांग में काफी महत्व है। छठ व्रती रेखा देवी ने बताया छठ पूजा में स्वच्छता का काफी ख्याल रखा जाता है। मिट्टी के चूल्हे और आम की सूखी लकड़ी का उपयोग पूजा के जरिये स्वच्छता के महत्व को स्पष्ट करते हैं। इस दिन मिट्टी के चूल्हे की कीमत तो 100 से 150 रुपए तक पहुँच जाती है। यही हाल लौकी जैसी कुछ खास सब्जियों को होता है। उन्होंने बताया प्रसाद रखने के लिए बाँस की बनी टोकरी की खरीद भी लोग शुरू कर देते हैं और इन दिनों इसकी कीमतें आसमान छूती दिखाई देती हैं।

Sunday, November 2, 2008

जमानत जघन्य अपराधों में सोच-विचारकर

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि हत्या, डकैती और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में जमानत स्वीकार करने से पहले अदालतों को आरोपी के खिलाफ अभियोजन और साक्ष्यों की प्रकृति का अध्ययन करना चाहिए। शीर्ष अदालत के अनुसार सत्र और उच्च न्यायालयों को अभियोजन की प्रकृति दंड की गंभीरता और सहायक साक्ष्यों की प्रकृति का अध्ययन करने के बाद ही जमानत स्वीकार करना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि जमानत स्वीकार करने से पहले अदालतों को यह मूल्यांकन कर लेना चाहिए कि कहीं किसी अभियुक्त द्वारा सबूतों से छेड़छाड़ करने या शिकायतकर्ता को धमकाए जाने की उचित आशंका तो नहीं है। न्यायाधीश अरिजीत पसायत और न्यायाधीश सीके ठक्कर की पीठ ने उत्तरप्रदेश के लखनऊ जिले में आशियाना पुलिस स्टेशन के अंतर्गत सुपारी लेकर एक व्यक्ति की हत्या करने के आरोपी की जमानत रद्द करते हुए किसी अभियुक्त को जमानत देने के लिए मानकों पर जोर दिया।
आरोप था कि अभियुक्त ने चंद्रपालसिंह की हत्या के लिए 10 लाख रुपए की सुपारी ली थी। 21 सितंबर 2006 को चंद्रपालसिंह की हत्या कर दी गई थी। सत्र अदालत ने हालाँकि अभियुक्त का जमानत आग्रह खारिज कर दिया था, लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अभियोजन के दावे के विपरीत कुछ निश्चित चीजों के आधार पर जमानत स्वीकार कर ली थी। उच्च न्यायालय के जमानत देने के फैसले से नाराज मृतक के परिजनों ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर आरोपी की जमानत रद्द करने की माँग की। परिजनों ने अपने वकील के माध्यम से शिकायत की कि उच्च न्यायालय ने एक तरह से आरोपी को बरी करने का फैसला लिख दिया है। पीड़ित परिवार की बातों से सहमति जताते हुए उच्चतम न्यायालय ने आरोपी की जमानत रद्द कर दी।

बच्चों में होती है बचत की आदत

अगर आप यह सोचते हैं कि बच्चे सिर्फ खर्च करना जानते हैं तो आप गलत हैं, क्योंकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अधिकतर बच्चों में बचत की प्रवृत्ति शुरू से पाई जाती है और जिनमें यह आदत नहीं होती उनके माता-पिता उन्हें यह सिखा देते हैं। बच्चों में गुल्लक के जरिये बचे हुए पैसे इकट्ठे करने की आदत होती है। उनकी इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने के लिए दो नवंबर को पिगी बैंक डे मनाया जाता है। बेसहारा बच्चों के लिए कार्यरत गैर सरकारी संगठन 'स्माइल फाउंडेशन' के वरिष्ठ प्रबंधक संदीप नायक ने कहा कि हमने पाँच से 11 वर्ष के छोटे बच्चों और फिर 12 से 20 वर्ष तक के किशोरवय के बच्चों के लिए कई प्रोजेक्ट चलाए हैं। इसके तहत हम उन्हें बुनियादी शिक्षा देते हैं जिसमें बचत के लिए उन्हें प्रवृत्त करना शामिल है।
उन्होंने कहा कि विभिन्न अध्ययनों में हमारा निष्कर्ष यही रहा है कि अधिकतर बच्चों में बचत की प्रवृत्ति शुरू से होती है। बेसहारा और गरीब बच्चों में यह आदत विशेष तौर पर इसलिए पाई जाती है क्योंकि वे विपरीत परिस्थितियों में जीते हैं। दिल्ली पब्लिक स्कूल की पाँचवीं कक्षा में अध्ययनरत अर्णव मिश्रा भी बचत करते हैं। वह कहते हैं मैं माता-पिता से जेब खर्च नहीं लेता लेकिन जब कभी बड़ों से त्योहारों पर कुछ रुपए मिलते हैं तो उन्हें खर्च नहीं करता और अभिभावकों के ही हवाले कर देता हूँ, ताकि जरूरत के समय के लिए यह बचत मेरे काम आए। अर्णव ने कहा कि स्कूलों में जब कभी शिक्षकों से अनौपचारिक चर्चा होती है, वे अकसर बचत पर जोर देते हैं। अध्यापक हमें बताते हैं कि रुपए लापरवाही से खर्च नहीं करना चाहिए बल्कि अचानक पड़ने वाली जरूरत के लिए उन्हें बचाकर रखना चाहिए। राजधानी स्थित चाइल्ड केयर डेवलपमेंट फाउंडेशन की कार्यकारी निदेशक दीपिका शर्मा ने कहा कि कुछ बच्चों में बचत की प्रवृत्ति होती है, लेकिन इसे विकसित करने में उनके माता-पिता की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। कई बार बड़ी बचत के बाद बच्चे उसे खर्च करना चाहते हैं, क्योंकि छोटी उम्र में उन्हें नई चीजें जानने की जिज्ञासा होती है। पिगी बैंक का इतिहास शब्द पिगी से जुड़ा है। मध्यकाल में यूरोप में पिगी एक तरह की मिट्टी होती थी जिससे रसोई के पात्र बनाए जाते थे। बाद में लोग इन पात्रों में बचत का धन रखने लगे और इसे पिगी बैंक के नाम से पहचाना जाने लगा। वर्तमान में वॉशिंगटन के सिएटल स्थित पाइक प्लेस बाजार में 600 पाउंड वजनी पिगी बैंक है जिसे कलाकार जार्जिया गेरबर ने बनाया है। इसे वहाँ दान के लिए रखा गया है और इससे सालाना नौ हजार अमेरिकी डॉलर की राशि एकत्रित की जाती है। इसका इस्तेमाल वहाँ का व्यावसायिक संगठन सामाजिक कार्यों के लिए करता है।

Saturday, November 1, 2008

बाल ठाकरे ने किया साध्वी प्रज्ञा का बचाव

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने मालेगाँव विस्फोट की मुख्य अभियुक्त साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर और मामले के अन्य अभियुक्तों के समर्थन में आते हुए हिन्दुत्व का दम भरने वाले उन लोगों और दलों को आड़े हाथों लिया, जिन्होंने इन लोगों से अपना पल्ला झाड़ लिया है। इसके साथ ही उन्होंने वकील समुदाय से इन लोगों का बचाव करने को कहा। शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में ठाकरे ने लिखा है कि पूरे हिन्दू समुदाय को साध्वी, सेना के अवकाश प्राप्त मेजर रमेश उपाध्याय और समीर कुलकर्णी का समर्थन करना चाहिए, जिन्हें इस मामले में फँसाया गया है।
ठाकरे ने कहा कि वे देश को कमजोर करने वाली किसी आतंकवादी कारवाई का समर्थन नहीं करते और मालेगाँव में हुई जन-धन की क्षति पर हमें खेद है। ठाकरे ने कहा कि यदि देश के कुछ छद्म धर्मनिरपेक्ष लोग अफजल गुरु (संसद हमले के अभियुक्त) का समर्थन कर सकते हैं तो हम साध्वी प्रज्ञा, रमेश उपाध्याय और समीर कुलकर्णी से प्रेम या उन पर गर्व क्यों नहीं कर सकते। ठाकरे ने कहा कि प्रतिदिन इस्लामी आतंकवादी भारत में आतंकी योजनाओं को अंजाम दे रहे हैं और हिन्दुओं को मार रहे हैं। अभी हाल ही में असम में हुए विस्फोट में भी बांग्लादेशी घुसपैठिए लिप्त पाए गए हैं। ऐसे परिदृश्य में यदि साध्वी प्रज्ञा, उपाध्याय अथवा समीर कुलकर्णी जैसे लोग पैदा होते हैं तो उसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि एटीएस मशीनरी को कांग्रेस इस्तेमाल कर रही है क्योंकि वह इसके जरिये अपना वोट बैंक बनाना चाहती है। यह एक प्रकार से हिन्दुओं को कुचलकर मुसलमानों को खुश करने का प्रयास है।

बैंकों के लिए और कैश का इंतजाम

आरबीआई ने एक बार फिर सीआरआर को 1 प्रतिशत घटाकर 5.5 प्रतिशत करने का एलान किया गया है। रिजर्व बैंक की इस कटौती से बैंकों को 40 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे। नई दर दो चरणों में लागू होगी। 0.5 प्रतिशत की कटौती 25 अक्टूबर,08 से और 0.5 प्रतिशत कटौती 8 नवंबर से प्रभावी होगी। इसके अलावा रेपो रेट में 0.5 प्रतिशत की कटौती की गई है। अब नई रेपो दर 7.5 प्रतिशत हो गई है। नई रेपो दर सोमवार यानी 3 नवंबर, 08 से लागू होगी। आरबीआई ने एसएलआर को भी 1 प्रतिशत से कम कर 24 प्रतिशत तक लाने का एलान किया है। SLR की नई दर भी 8 नवंबर, 08 से लागू होगी।
पिछले कुछ दिनों में आरबीआई ने तीसरी बार अपनी महत्वपूर्ण दरों में बदलाव किया है। सीआरआर में हाल में 3.5 फीसदी तक की कटौती की जा चुकी है। वैश्विक वित्तीय संकट को देखते हुए बाजार में नकदी का बेहतर नियंत्रण करना और विकास दर को काबू में करना सरकार के लिए बहुत जरूरी हो गया है। इसलिए आरबीआई ने अपनी प्रमुख दरों में एक बार और बदलाव करने का फैसला किया।
इस वित्तीय वर्ष में विकास दर 8 प्रतिशत से नीचे रहने की उम्मीद है। यह भी आरबीआई के लिए एक चिंता का विषय है क्योंकि वैश्विक उत्पादन में गिरावट को देखते हुए निर्यात में कमी हो रही है। औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर भी कम होकर 1.3 प्रतिशत पर आ गई है।
रेपो दर : बैंकों को अपने दैनिक कामकाज के लिए प्राय: ऐसी बड़ी रकम की जरूरत होती है जिनकी मियाद एक दिन से ज्यादा नहीं होती। इसके लिए बैंक जो विकल्प अपनाते हैं, उनमें सबसे सामान्य है केंद्रीय बैंक (भारत में रिजर्व बैंक) से रात भर के लिए (ओवरनाइट) कर्ज लेना। इस कर्ज पर रिजर्व बैंक को उन्हें जो ब्याज देना पड़ता है, उसे ही रेपो दर कहते हैं।
रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो जाएगा और इसलिए बैंक ब्याज दरों में कमी करेंगे, ताकि ज्यादा से ज्यादा रकम कर्ज के तौर पर दी जा सके। रेपो दर में बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह होता है कि बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से रात भर के लिए कर्ज लेना महॅँगा हो जाएगा। साफ है कि बैंक दूसरों को कर्ज देने के लिए जो ब्याज दर तय करते हैं, वह भी उन्हें बढ़ाना होगा।
सीआरआर : सभी बैंकों के लिए जरूरी होता है कि वह अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास जमा रखें। इसे नकद आरक्षी अनुपात कहते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि अगर किसी भी मौके पर एक साथ बहुत बड़ी संख्या में जमाकर्ता अपना पैसा निकालने आ जाएँ तो बैंक डिफॉल्ट न कर सके।

आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बिना जब बाजार से तरलता कम करना चाहता है, तो वह सीआरआर बढ़ा देता है। मंगलवार को मौद्रिक नीति की सालाना समीक्षा के बाद सीआरआर 5.5 फीसदी हो गया है, यानी बैंकों को अब अपने 100 रुपए के कैश रिजर्व पर 5.5 रुपए का रिजर्व रखना होगा। इससे बैंकों के पास बाजार में कर्ज देने के लिए ज्यादा रकम बचेगी।
एसएलआर : कैश रिजर्व रेशियो के अलावा बैंकों को अपनी जमा राशि का एक निश्चित भाग सरकारी प्रतिभूतियों में भी जमा करना पड़ता है। यह राशि उनकी वैधानिक तरलता रेशियो (एसएलआर) कहलाती है। एसएलआर का प्रमुख उद्देश्य अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक धन को बाजार में लाने से बैंकों को रोकना है।

Friday, October 31, 2008

पति से रोज पिटती हैं चालीस फीसदी महिलाएँ

घरेलू हिंसा के मामले में अव्वल है बिहार
बिहार के पति खुद को घर का शेर समझते हैं, इसलिए किसी न किसी बहाने अपनी पत्नियों पर वे सबसे ज्यादा घरेलू हिंसा करते हैं। दूसरी तरफ ऐसे अत्याचारी पतियों के खिलाफ हिम्मत जुटाकर कानून का हंटर चलाने में छत्तीसगढ़ की महिलाएँ सबसे आगे हैं। तीन साल में घरेलू हिंसा कानून के तहत पति के हाथों पिटने वाली छत्तीसगढ़ की महिलाओं ने पतियों के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें दर्ज कराई हैं।
2007 में जारी तीसरे राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण के मुताबिक देश की 40 फीसदी महिलाएँ किसी न किसी बहाने रोज ही अपने पतियों से पिटती हैं। शिक्षित महिलाओं पर जहाँ 12 फीसदी घरेलू हिंसा होती है, वहीं अशिक्षितों पर 59 फीसदी। इस मामले में बिहार सबसे आगे है, पर अत्याचारी पतियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और मामला दर्ज कराने में छत्तीसगढ़ की महिलाएँ ज्यादा सजग हैं।
नेशनल क्राइम ब्यूरो के रिकॉर्ड के मुताबिक 2005 में पूरे देश में घरेलू हिंसा कानून के तहत 1497 मामले दर्ज किए गए। इसमें अकेले छत्तीसगढ़ से 1390 मामले हैं। 1996 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर हुए और 184 के खिलाफ दोष सिद्घ हुए। 2076 लोगों को गिरफ्तार किया गया। घरेलू हिंसा के तहत मामले दर्ज कराने में छत्तीसगढ़ के बाद चंडीगढ़ की महिलाएँ सामने आई हैं। चंडीगढ़ में 2005 में 75 मामले दर्ज किए गए और 56 के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किए गए। 148 लोगों पर इस कानून की गाज गिरी और वे गिरफ्तार हुए। वर्ष 2006 में भी छत्तीसगढ़ से ही सबसे ज्यादा मामले सामने आए। देशभर से 1736 मामले दर्ज हुए, जिसमें छत्तीसगढ़ की संख्या 1421 है। इनमें 1214 के खिलाफ आरोप-पत्र दायर हुआ तो 2028 लोगों की गिरफ्तारी हुई। गुजरात से घरेलू हिंसा के 150, पंजाब से 17 और उत्तरप्रदेश से 13 मामले सामने आए। वर्ष 2007 में घरेलू हिंसा के 2921 मामले दर्ज हुए। इसमें छत्तीसगढ़ से 1651 मामले दर्ज हुए।
इनमें 1249 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर हुए और 2206 पर कार्रवाई हुई। इस साल गुजरात में भी मामलों की संख्या बढ़ गई और 883 मामले दर्ज किए गए, वहीं महाराष्ट्र से 117, राजस्थान से 25 व यूपी से 25 मामले सामने आए। क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो में मध्यप्रदेश, झारखंड, बिहार, उड़ीसा, मेघालय और मिजोरम के रिकॉर्ड दर्ज नहीं है। घरेलू हिंसा कानून 26 अक्टूबर 2006 को प्रभाव में आया था, पर इस कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए उड़ीसा, राजस्थान, पंजाब, झारखंड व कर्नाटक ने संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की है।

Tuesday, October 28, 2008

रियलिटी शो का सच



टीवी पर आ रहे रियलिटी और टैलेंट शो जहाँ कुछ की किस्मत चमका देते हैं तो कुछ को अस्पताल भी पहुँचा सकते हैं। जैसा हाल ही में कोलकाता की 16 साल की शिंजिनी सेनगुप्ता के साथ हुआ। शिंजिनी एक शो में नृत्य प्रतिस्पर्धा में भाग ले रही थी और एक राउंड में उनके खराब नाच पर शो के जजों की फटकार पर वे न केवल रोईं बल्कि उनको इतना सदमा लगा कि उन्हें लकवा मार गया। उनका बेंगलुरु के एक अस्पताल में इलाज हो रहा है और डॉक्टरों का कहना है की शायद उन्हें पहले से ही कुछ बीमारी थी, जिस पर सार्वजनिक फटकार ने उनकी ये हालत कर दी। शिंजिनी की हालत पर बहस इस बात पर छिड़ गई कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
बहस : इस तरह के शो पर भी सवाल उठने लगे और नियम कानून बनाने की चर्चा होने लगी। जाने-माने टीवी प्रोड्यूसर सिद्धार्थ बसु कहते हैं कि मैं समझता हूँ कि शिंजिनी के साथ जो घटना हुई है वो खतरे की घंटी है। चाहे बड़ा हो या छोटा, बेवजह किसी को भी अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों के लिए तो मापदंड अलग से तय होने ही चाहिए।
इस सारे घटनाक्रम में जजों की भूमिका पर सवाल उठे। क्या वे जरूरत से ज्यदा कह जाते हैं। 'सा रे गा मा' और 'जो जीता वही सिकंदर' में भाग ले चुकी हिमानी कहती हैं कि मेरा सा रे गा मा का अनुभव बहुत सकारात्मक रहा। मुझे बहुत ज्यादा निगेटिव कमेंट्स नहीं मिले। खुद के भीतर वो क्षमता होनी चाहिए कि मंच पर हमारे साथ कुछ भी हो सकता है। हिमानी कहती हैं कि जज ही हैं जो हमें जीरो से हीरो बना देते हैं या फिर हमें इतना सुना दें कि हमारा मनोबल ही टूट जाए। जजों को भी थोड़ा खयाल रखना चाहिए कि ऐसा न बोलें जिससे प्रतियोगी को जबरदस्त धक्का लगे।
डगर नहीं आसान : काजी तौकीर टीवी में टैलेंट शो के शुरुआती दौर के एक प्रतियोगी हैं। उनके लिए फेम गुरुकुल में जीत फायदे का सौदा रहा। वे भी कहते हैं कि प्रतियोगिता में जीत तो सबको दिखती है पर इसकी डगर आसान नहीं होती।


तौकीर कहते हैं कि मैंने चुनौती स्वीकार की, आलोचनाएँ झेलीं और प्रतियोगिता जीती। कुछ लोग आलोचना नहीं झेल पाते, लेकिन प्रतियोगियों को ये समझना चाहिए कि ये रियलिटी शो का हिस्सा हैं और आलोचना तो उन्हें झेलनी ही पड़ेगी। शिंजिनी के माँ-बाप सारा दोष जजों पर मढ़ रहे हैं पर ऐसे शो में जज बनने वालों का तर्क है कि अगर आप सही गलत नही बताएँगे तो प्रतियोगी कैसे अपने को सुधारेंगे, बेहतर बना पाएँगे ताकि जीत की इस दौड़ में आगे हों। 'जो जीता वही सिकंदर' में जज और विशाल-शेखर नामक मशहूर संगीत निर्देशक जोड़ी के शेखर कहते हैं कि गायक को उसकी कमियाँ बताना बहुत जरूरी है। लेकिन टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में कुछ जज बहुत ज्यादा बोल जाते हैं, ये सही नहीं है। गायकों को बहुत प्यार से समझाना चाहिए। कुछ शो तो उकसाने-भड़काने वाले बनाए ही जाते हैं... यानी लोकप्रियता या टीवी की भाषा में टीआरपी के फेर में तड़का जरूरी है। मीडिया आलोचक शैलेजा वाजपेयी कहती हैं कि ये सारे रियलिटी शो विदेशी शो की नकल हैं। मसलन हैल्थ किचन नामक शो में तो जज गाली तक देते हैं। अगर शो में ड्रामेबाजी नहीं होगी तो इन्हें कौन देखेगा। पर टीआरपी के चक्कर में कभी-कभी हदें भी पार हो जाती हैं और शिंजिनी जैसी घटनाएँ भी घट जाती हैं।
डाँट-फटकार : डाँट-फटकार का कई बार गहरा असर हो जाता है, खासकर बच्चों पर। अपोलो अस्पताल में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. संदीप वोहरा कहते हैं कि शिंजिनी का मामला बहुत गंभीर है। बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। जजों को बहुत सोच-समझकर और सावधानी से टिप्पणियाँ करनी चाहिए।


तो सवाल ये उठता है कि क्या टीआरपी की होड़ में कहीं प्रोड्यूसर शो के जजों पर ज्यादा ड्रामा करने का दबाव तो नहीं डालते। क्या सब कुछ पहले से तय होता है। सिद्धार्थ बसु ऐसा नही मानते। वे कहते हैं कि मैं नहीं मानता कि किसी भी शो में प्रतियोगी को तैयारी कराई जा सकती है। प्रदर्शन अच्छा रहेगा तो शो अच्छा रहेगा। ड्रामेबाज़ी से कुछ नहीं होता। लड़ाई-झगड़े या बनावटी सनसनी से टीआरपी नहीं बढ़ती। कुछ जिम्मेदारी परिवारों की भी है। उन्हें भी सोचना चाहिए कि उनके बच्चे उनकी अभिलाषा पूरी करने का जरिया नहीं हैं और न ही कमाई का साधन। इसी ओर इशारा किया महिला और बाल कल्याण मंत्री रेणुका चौधरी ने। वे कहती हैं कि माँ-बाप से भी पूछा जाना चाहिए कि ये जानते-बूझते भी कि उनके बच्चे इतने नाजुक हैं, वे बच्चों पर दबाव क्यों डालते हैं। फेम गुरुकुल विजेता काजी आज फिल्मों में काम कर रहे हैं। कुछ विजेताओं को फ़िल्मों में गाने का मौका मिला, कुछ का करियर चल निकला।

शो का लोभ : इसलिए इन शो का लोभ भी बढ़ा है और तादाद भी। पर इसका एक नकारात्मक प्रभाव ये पड़ा कि अब इतने विजेता हो गए हैं कि दर्शक भी कम हो गए हैं और जीत के फायदे भी।
हिमानी कहती हैं कि फायदा तब था जब एक-दो शो चल रहे थे। अब तो इतने शो चल रहे हैं कि जो थोड़ा बहुत भी गाता है ऑडिशन देने चला आता है। पर रियलिटी शो ने गाँवों और छोटे शहरों के कई गुमनाम लोग रातोरात राष्ट्रीय स्टार बना दिया। इसे करोड़ों लोगों ने देखा कि कई परिवारों को लगने लगा कि उनका चिंटू, उनकी गुडिया भी किसी से कम नहीं है। शैलेजा वाजपेयी कहती हैं कि एक तरह से ये अच्छा है। छोटे शहरों के बच्चों को मौका मिल रहा है, लेकिन पहले इंडियन आइडल अभिजीत सावंत को ही लीजिए। एक-दो एलबम के बाद वो कहाँ हैं। पता नहीं। तो क्या शो के लिए नियम कानून बनाए जाने चाहिए या फिर इन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए, खासकर जिनमें बच्चे भाग लेते हैं।

जिम्मेदारी : डॉ. संदीप वोहरा कहते हैं कि शो हों पर जिम्मेदारी भरे हों। शो के नियम कानून होने चाहिए। ऐसा न हो कि अभिभावक अपनी महत्वाकांक्षा के लिए बच्चों पर शो में शामिल होने का दबाव बनाएँ। इन शो में अक्सर बच्चों को उम्र से पहले बड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है। उन्हें बड़ों जैसे कपड़े पहनाए जाते हैं, मेकअप किया जाता है।
संगीत निर्देशक शेखर कहते हैं कि बच्चों को बच्चा रहना दें। रियलिटी शो बच्चों के लिए ठीक नहीं हैं। प्रतियोगिता के बजाय ट्रेनिंग शो होना चाहिए। माँ-बाप को बच्चों की प्रतिभा निखारनी चाहिए। वहीं सिद्धार्थ बसु भी बच्चों पर बहुत दबाव डालने के खिलाफ हैं। वे कहते है नियम टीवी उद्योग को खुद बनाने चाहिए और अभिभावकों को भी जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए। वो कहते हैं कि माँ-बाप का बच्चों को प्रोत्साहित करना सही है, लेकिन एक सीमा तक ही ये ठीक है। यानी मुनाफे के लिए और मनोरंजन का साधन बने इन शो के निर्माताओं को जहाँ ज़्यादा जिम्मेदारी दिखाने कि जरूरत है, वहीं जजों को समझना चाहिए कि उन पर शो टिके हैं और शो के दौरान बच्चे उनके हर शब्द को पत्थर की लकीर मानते हैं। ऐसे में वे कहीं बच्चों को आहत तो नहीं कर रहे हैं। माँ-बाप को भी सोचना जरूरी है कि प्रतिस्पर्धा, लोकप्रियता और कमाई के लालच में कहीं वे अपनी बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव तो नही डाल रहे। कहीं आगे बढ़ने की इस अंधी दौड़ में वो अपनी बच्चों की जान शिंजिनी कि तरह खतरे में तो नहीं डाल रहे हैं।




उपहारों पर भी पड़ी मंदी की मार



दुनियाभर में छाई आर्थिक मंदी से अब उपहार भी नहीं बच पाए हैं। मंदी के कारण व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने दीवाली पर दिए जाने वाले उपहार का बजट कम से कम 25 फीसदी घटा दिया है। अपने सदस्यों से बातचीत के बाद वाणिज्य और उद्योग संगठन एसोचैम इस आकलन पर पहुँचा है कि आर्थिक मंदी को देखते हुए औद्योगिक और व्यावसायिक संगठनों ने अपने उपहारों के बजट में पच्चीस फीसदी की कटौती की है। एसोचैम ने यह आकलन अपने सदस्यों से मिले 'फीडबैक' और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के 2007 के उपहारों के बजट के आधार पर किया है।

बजट घटाया : पिछले साल दीवाली पर इन व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने करीब 2000 करोड़ रुपए के उपहार बाँटे थे। संगठन का अनुमान है कि इस साल यह बजट पाँच सौ करोड़ रुपए घटकर केवल 1500 करोड़ रुपए ही रह गया है।
एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने बताया व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने इस साल दीवाली पर उपहार देने के लिए जिन वस्तुओं का चयन किया है, उनमें से अधिकतर चीन से आयात की गई हैं, क्योंकि वे काफी सस्ती हैं और उनकी पैकेजिंग भी बढ़िया मानी जाती है।
पिछले साल दीवाली पर इन प्रतिष्ठानों ने सोने-चाँदी के सिक्के, कलाई घड़ी, ब्रीफकेस, पीतल और चाँदी के बर्तन, मोमबत्ती स्टैंड और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि उपहार में बाँटे थे। डीएस रावत ने कहा व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने इस साल इन वस्तुओं को खरीदेने से परहेज किया है, क्योंकि इनके दाम काफी अधिक हैं। इस साल उपहार देने के लिए व्यापारिक घरानों ने प्लास्टिक के सामान, खिलौने और अन्य आकर्षक वस्तुओं की खरीद की है। महँगाई की मार के बीच थोक बाजार में सूखे मेवे की बिक्री में पिछले कुछ दिनों में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है, क्योंकि सूखे मेवे को त्योहारों का अच्छा उपहार माना जाता है। डीएस रावत का मानना है कि कच्चे माल की बढ़ती लागत, गिरती अर्थव्यवस्था और महँगे होते कर्ज ने व्यापारिक घरानों को उपहारों का बजट कम करने के लिए मजबूर किया है। उन्होंने कहा कि अगर यह गिरावट अगले एक-दो महीने और जारी रही तो ये व्यापारिक घराने अपने संसाधनों को रिश्ते मजबूत करने पर खर्च करने से परहेज करेंगे। उपहारों को बजट सबसे अधिक आईटी, बीपीओ, विमानन उद्योग, एफएमसीजी, पर्यटन, रिटेल, इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल और रीयल इस्टेट के घरानों ने कम किया है। ये घराने केवल चुने हुए लोगों को ही उपहार दे रहे हैं, क्योंकि आर्थिक मंदी की मार सबसे अधिक इन्हीं क्षेत्रों पर पड़ी है, जिससे इनकी आमदनी घटी है।

Saturday, October 25, 2008

मालेगांव धमाके में एक और साध्वी गिरफ्तार

मालेगांव विस्फोट की साजिश का पर्दाफाश करने में जुटी पुलिस का कहना है कि इंडियन मुजाहिदीन के मुकाबले के लिए दो दक्षिणपंथी संगठन बनाए गए हैं। पुलिस इन संगठनों की जांच करेगी।विस्फोट की साजिश का पर्दाफाश करने के क्रम में कई और गिरफ्तारियों की खबर है। गिरफ्तार किए गए लोगों में एक और साध्वी व सेना के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी भी शामिल हैं। साध्वी को भोपाल से गिरफ्तार किया गया है, जबकि सेना के कुछ पूर्व अधिकारियों से मुंबई में पूछताछ की जा रही है। महाराष्ट्र के नासिक से भी कुछ गिरफ्तारियां होने के संकेत हैं। उधर, दक्षिणपंथी संगठन श्री राम सेना खुल कर साध्वी प्रज्ञा व उनके साथियों के समर्थन में उतर गई है।मालेगांव धमाके के सिलसिले में सूरत से एक साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को गिरफ्तार किए जाने के बाद मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक और साध्वी की गिरफ्तारी की खबर है। हालांकि पुलिस इस बारे में मुंह नहीं खोल रही है। मुंबई में पूर्व सैन्य अधिकारियों से पूछताछ के बारे में भी आधिकारिक रूप से कोई कुछ नहीं बता रहा। एटीएस ने शनिवार को बस इतना बताया कि जिन तीन लोगों को शुक्रवार को अदालत ने पुलिस रिमांड पर भेजा, उन्होंने दो दक्षिणपंथी संगठन बना रखे थे। ये संगठन इंदौर और सूरत में स्थित थे। ये संगठन इंडियन मुजाहिदीन की ओर से किए जाने वाले हमलों का जवाब देने के लिए बनाए गए थे। एटीएस के अधिकारियों ने बताया कि महाराष्ट्र पुलिस इन दोनों संगठनों की जांच करेगी।साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, शिवनारायण और श्याम साहू को सूरत और इंदौर से गिरफ्तार किया गया था। इन सभी को शुक्रवार को अदालत में पेश किया गया था। अदालत ने इन्हें तीन नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया था। इनकी मदद के लिए शनिवार को एक दक्षिणपंथी संगठन आगे आया। श्री राम सेना ने इन्हें कानूनी मदद की पेशकश की है। यह वही संगठन है, जो हाल में नई दिल्ली में एम.एफ. हुसैन की पेंटिंग प्रदर्शनी में तोड़फोड़ करने के बाद चर्चा में रहा था।सेना के महासचिव विनय सिंह ने दिल्ली में कहा कि ये गिरफ्तारियां राजनीति से प्रेरित हैं। इसलिए उनका संगठन आरोपियों को कानूनी मदद मुहैया कराएगा। सेना औपचारिक तौर पर खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध नहीं मानती, लेकिन तीन साल पहले इसकी स्थापना संघ के एक पूर्व अधिकारी प्रमोद मुत्तालिक ने की थी। संगठन की राजनीतिक ईकाई राष्ट्रीय हिंदुस्तान सेना भाजपा विरोध की नीति पर चलती है।उधर, मुंबई में एटीएस के संयुक्त पुलिस आयुक्त हेमंत करकरे ने बताया कि वैसे तो कोई खास संगठन नहीं है, जिससे ये तीनों संबद्ध हों, लेकिन जय वंदे मातरम, जय कल्याण समिति नामक संगठन के पंपलेट हमें मिले हैं। ये संगठन 2992 में प्रज्ञा सिंह ने स्थापित किए हैं। मोबाइल फोन स्टोर चलाने वाले साहू ने इंदौर में राष्ट्रीय जागरण मंच नाम से संगठन बना रखा है। करकरे ने फिलहाल इन लोगों के किसी दक्षिणपंथी संगठन से संबद्ध होने की पुष्टि करने से इनकार किया, लेकिन यह जरूर कहा कि इनके पास से दक्षिणपंथी साहित्य मिला है। इनके फोन रिकार्ड की भी जांच हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि 29 सितंबर को मालेगांव में हुए धमाकों की साजिश से ये तीनों अंजान नहीं हो सकते।उधर, एटीएस का एक तीन सदस्यीय दल शनिवार को भोपाल पहुंचा। पुलिस सूत्रों ने औपचारिक तौर पर कुछ बताने से इनकार किया, लेकिन सूत्रों के मुताबिक भोपाल से कुछ और गिरफ्तारियां हुई हैं।इस बीच, भाजपा ने इन तीनों की गिरफ्तारी पर पुलिस से स्पष्टीकरण की मांग की है। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने नागपुर में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में कहा कि पुलिस को कथित तौर पर हिंदू जागरण मंच से संबंध रखने वाले व्यक्तियों की गिरफ्तारी के बारे में मीडिया को स्पष्ट तौर पर सब कुछ बताना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये गिरफ्तारियां राजनीतिक संतुलन साधने की साजिश का हिस्सा हैं।

पुलिस के सामने हुआ दुष्कर्म: नन

उड़ीसा के कंधमाल में हिंसा के दौरान दुष्कर्म की शिकार नन ने शुक्रवार को कहा कि उसके साथ पुलिस के सामने दुष्कर्म हुआ और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। मीडिया से पहली बार रूबरू होते हुए नन ने कहा कि उसे राज्य की पुलिस पर भरोसा नहीं है और इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए।पीड़िता सिस्टर मीना [काल्पनिक नाम] ने अपने साथ हुई घटना की विस्तृत जानकारी देते हुए संवाददाता सम्मेलन में कहा कि गत 25 अगस्त को उसके साथ जो कुछ भी हुआ वह सब स्थानीय पुलिस के सामने हुआ और पुलिस ने हमलावरों से उसे बचाने के लिए कुछ नहीं किया। उसने कहा कि मेरे साथ दुष्कर्म हुआ है और मैं फिर से उड़ीसा पुलिस की यातना झेलना नहीं चाहती।पीड़िता नन अपनी व्यथा लिखकर लाई थी जिसे उसने पढ़कर सुनाया। उसने आरोप लगाया कि पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में ढिलाई बरती और उसका बयान दर्ज नहीं किया गया। नन ने कहा कि मेरे साथ दुष्कर्म हुआ है और मैं फिर से उड़ीसा पुलिस की यातना झेलना नहीं चाहती।गौरतलब है कि उड़ीसा के कंधमाल जिले स्थित जलेशपाटा आश्रम में गत 23 अगस्त को अज्ञात हमलावरों ने विश्व हिंदू परिषद [विहिप] के नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार समर्थकों की हत्या क र दी थी। इस घटना के बाद जिले में फैली सांप्रदायिक हिंसा में उपद्रवियों ने कई गिरजाघरों को निशाना बनाया और ईसाइयों के घर फूंक डाले।इस हिंसा के दौरान दुष्कर्म की शिकार नन ने सुप्रीम कोर्ट से न्याय की गुहार की। हालांकि अदालत ने गत 22 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि फिलहाल इस मामले को सीबीआई को सौंपने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है।प्रेस कांफ्रेंस के दौरान किसी को भी पीड़िता नन से सवाल जवाब की अनुमति नहीं थी, लेकिन वहां मौजूद आल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के महासचिव और राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य आर्क बिशप जॉन दयाल ने कहा कि हम न्याय के लिए लड़ाई जारी रखेंगे और इस मामले की सीबीआई जांच के लिए पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे।

उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में पिछले दिनों की हिंसा में समुदाय विशेष के निर्दोष व्यक्तिओं को निशाना बनाया गया और अब राज्य सरकार अभियुक्तों को सजा देने में ढील बरत कर रही है। आर्क बिशप ने कहा कि हम चाहते हैं कि राज्य में वर्ष 2007 में हुई हिंसा के अलावा विहिप नेता की हत्या तथा उसके बाद फैली सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की जांच सीबीआई से कराई जाए।जान दयाल ने कहा कि हम उन लोगों के खिलाफ भी आपराधिक शिकायत दर्ज करने जा रहे हैं जिन्होंने हमारे खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया। हालांकि उन्होंने आरोप लगाया कि कंधमाल जिले में हुई हिंसा में दिवंगत सरस्वती और उनके समर्थकों का ही हाथ है।जान दयाल ने कहा कि उडीसा पुलिस से उनका विश्वास उठ गया है और ईसाई समुदाय के हजारों लोग आज भी शरणार्थी शिविरों में हैं तथा अपने घर लौटने को लेकर सहमे हुए हैं।इस दौरान दिल्ली कैथोलिक चर्च के प्रवक्ता फादर डोमिनिक इमैनुअल ने यह प्रेस कांफ्रेंस देश की राजधानी में कराए जाने की वजह पूछे जाने पर कहा कि मीडिया का जमावड़ा होने की वजह से हमारी बात ज्यादा लोगों के बीच जाएगी और अदालत अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की सोचेगी।उन्होंने नोएडा के बहुचर्चित आरुषि हेमराज हत्याकांड का हवाला देते हुए कहा कि मीडिया के कवरेज की वजह से ही इस मामले की सीबीआई जांच की गई और हमें उम्मीद है कि इस ईसाइयों के साथ अत्याचार की घटना की भी सीबीआई जांच होगी।

Thursday, October 23, 2008

लंबे चुंबन से भी फैलता है एड्स!

इंदौर के एक डॉक्टर ने कंडोम को एड्स से बचाव के लिए कथित तौर पर ब्रह्मास्त्र की तरह बताने वाले सरकारी प्रचार अभियानों का कड़ा विरोध करते हुए फौरन इन पर रोक लगाने की माँग की है। डॉक्टर का आरोप है कि एचआईवी संक्रमण की दूसरी वजहों पर जागरुकता फैलाने की ओर भारत सरकार का ध्यान अपेक्षाकृत कम है, जिनमें कुछ अनुसंधानों के मुताबिक इसकी वजहों में लंबा चुंबन भी शामिल है। इंदौर के डॉ. मनोहर भंडारी ने बताया वे अपने वकील के जरिये इस सिलसिले में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन नाको को कानूनी नोटिस भी भेज चुके हैं। 26 सितंबर को भेजे गए नोटिस में जोर देकर दावा किया गया है कि लंबे चुंबन से भी एड्स फैल सकता है। शहर के एक चिकित्सा महाविद्यालय में नौकरी करने वाले डॉ. भंडारी ने आरोप लगाया कि सरकार और उससे जुड़ी विभिन्न एजेंसियाँ उक्त वैज्ञानिक तथ्य को छिपाने की कोशिश कर रही हैं, जो बेहद दुर्भाग्यजनक है। नोटिस में कहा गया है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं डॉक्टरों और नर्सों के लिए सरकारी एजेंसियों की ओर से एड्स पर प्रकाशित प्रशिक्षण माड्यूल में चुंबन और एड्स के संबंधों पर अलग-अलग बातें सामने आती हैं।
भंडारी ने कहा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए प्रकाशित प्रशिक्षण माड्यूल में उल्लेख किया गया है कि चुंबन या आलिंगन से एड्स नहीं फैलता। उन्होंने नर्सों के लिए जारी प्रशिक्षण माड्यूल में चुंबन के संदर्भ को बेहद उलझा हुआ बताया। उन्होंने उक्त माड्यूल के हवाले से कहा कि साधारण चूमने से भी एड्स संक्रमण नहीं होता। ज्यादातर वैज्ञानिकों का मानना है कि अधिक समय तक लिए गए चुंबन से एचआईवी संक्रमण संभव है, क्योंकि इसमें रक्त ज्यादा देर तक परस्पर संपर्क में रहता है। साधारणतः इसकी आशंका कम ही रहती है। नोटिस के मुताबिक डॉक्टरों के लिए प्रकाशित प्रशिक्षण माड्यूल में सूखे चुंबन जैसे आकस्मिक संपर्क को एड्स के मामले में सुरक्षित बताया गया है। डॉ. भंडारी की मानें तो इस विषय पर किए गए कुछ अनुसंधान कहते हैं कि मसूड़े क्षतिग्रस्त हों अथवा मुँह में कोई घाव या छाला हो तो एड्स संक्रमित शख्स को लंबे समय तक चूमने से यह बीमारी साथी में भी घर कर सकती है। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि एड्स से बचाव के लिए सरकार द्वारा केवल कंडोम का प्रचार आम जनता को गुमराह कर रहा है। डॉ. भंडारी के वकील सुरेश नारायण सक्सेना ने नोटिस में सरकार को चेतावनी भरे लफ्जों में कहा है कि वह एचआईवी संक्रमण की दूसरी वजहों पर भी आम जन के लिए जोरदार जागरुकता अभियान चलाए। इस बीच एड्स के साथ जी रहे लोगों के लिए काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन ने कहा कि यह दावा सरासर गलत है कि कंडोम को सरकार हौवा बनाकर पेश कर रही है।
मध्यप्रदेश नेटवर्क ऑफ पीपुल लिविंग विद एचआईवी पॉजीटिव के मनोज वर्मा ने कहा देश में एड्स संक्रमण के ज्यादातर मामले असुरक्षित यौन संबंधों के चलते सामने आते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कंडोम न केवल एड्स के खतरे से बचाता है, बल्कि कई गुप्त रोगों और अवांछित गर्भ से भी रक्षा करता है। लिहाजा कंडोम का जोरदार प्रचार-प्रसार किया जा रहा है तो इसमें आखिर क्या बुराई है।

युवाओं में बढ़ रही है जीवन बदलने की चाह

समाज में बढ़ती गलाकाट प्रतिस्पर्धा और घटते मूल्यों के बीच लोगों में अपने जीवन को बदलने की चाह बढ़ रही है तथा विशेषज्ञों के अनुसार इस दिशा में देश की युवा पीढ़ी अधिक गंभीर नजर आ रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार आज की युवा पीढ़ी का जीवन के प्रति कहीं अधिक व्यावहारिक नजरिया है और इसलिए वे अपनी पेशेवर जिंदगी के साथ-साथ निजी जिंदगी की समस्याओं को सुलझाने के लिए डॉक्टर काउंसलर सहित अन्य विशेषज्ञों के पास जाने में हर्गिज संकोच नहीं करते।
शायद इसके पीछे उनमें जीवन को चुस्त-दुरुस्त रखने की मंशा भी मुख्य प्रेरणा हो सकती है। पश्चिम में आज के दिन मनाए जाने वाले चेंज योर लाइफ डे की प्रासंगिकता भारत में भी दिनोदिन बढ़ रही है।भारत के नगरीय जीवन में शिक्षा ही नहीं करियर, बचत, निवेश, जमीन-जायदाद और विवाह पूर्व काउंसिंलिंग जैसी सेवाओं की माँग बढ़ रही है।
फ्रांसीसी कंपनी विज्ञान की भारतीय शाखा के मुख्य कार्य अधिकारी एवं मोटिवेटर पवन चौधरी ने कहा कि आज लोग अपने जीवन की समस्याओं को लेकर काउंसलरों और अन्य विशेषज्ञों के पास जा रहे हैं, जिससे पता चलता है कि हमारा समाज तरक्की कर रहा है। लोगों विशेषकर युवाओं में बदलाव की चाहत बढ़ रही है।

Wednesday, October 22, 2008

साँपों को भी नहीं छोड़ते शिकारी

मैंने हाल ही में समाचार-पत्रों में पढ़ा था कि केंद्र सरकार ने सँपेरों पर प्रतिबंध लगा दिया है। यदि यह सत्य है तो यह पिछले तीन वर्षों में इस सरकार से मिलने वाली पहली अच्छी खबर है। फिर भी मैं आश्चर्यचकित हूँ कि सरकार पहिए का फिर से आविष्कार कर रही है।
साँप को पकड़ना, उसका उपयोग तथा बिक्री को 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम द्वारा प्रतिबंधित किया गया था। पुलिस घूमने वाले प्रत्येक सँपेरों को इसलिए नहीं पकड़ती, क्योंकि अधिकांश निचले स्तर पर पुलिस वालों को अभी तक इस कानून के बारे में नहीं पता है।
संभवतः कुछ गाँव अभी भी सँपेरों से भरे पड़े हैं। जैसे कि आगरा में सकलपुर, हरियाणा में मेवास, जैसे कई गाँव जिनमें छापा मारकर वहाँ के सारे निवासियों को गिरफ्तार करके 7 वर्ष के लिए जेल में भेज देना चाहिए।
भारत में हम अभी भी वन्यजीव की रक्षा को गंभीरतापूर्वक नहीं लेते हैं। जरा कल्पना कीजिए कि ठगी अथवा राजमार्ग पर डकैती तथा हत्या पर प्रतिबंध लगाने का विरोध करने के लिए ठगों (वही जो आगरा के आसपास उन्हीं गाँवों में रहते हैं) द्वारा एक बैठक बुलाई गई होती। तब क्या हुआ होता? पुलिस अपराधियों के इकट्ठा होने की प्रतीक्षा करती और फिर उन पर टूट पड़ती। इस बैठक में भी ऐसा ही होना चाहिए था, किंतु खेद है कि ऐसा नहीं हुआ। अब इसके बाद तो तिब्बत में शेर तथा चीते की खाल ले जाने वाले अवैध शिकारियों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी यूनियन की एक ऐसी ही बैठक आयोजित करें और इसका विरोध करें कि यदि अवैध शिकार को रोक दिया गया तो तिब्बती नंगे रह जाएँगे।इन अवैध शिकारियों द्वारा आयोजित की गई बैठक में इस पर बल दिया गया कि वे लोग संकटापन्न प्रजातियों को कभी हाथ नहीं लगाएँगे और पकड़े गए साँपों को वार्षिक प्रजनन काल के प्रारंभ में वापस जंगलों में छोड़ देंगे।
नियमित रूप से पशु हत्या के अपराधियों का पता लगाने तथा उन्हें गिरफ्तार करने वाले हजारों व्यक्तियों के एक नेटवर्क की अध्यक्ष के रूप में मैं जानती हूँ कि ये दोनों बातें ही पूर्णतः असत्य हैं। हमने दिल्ली में ही सैकड़ों किंग कोबरा तथा अन्य गंभीर रूप से संकटापन्न प्रजातियों को पकड़ा है। हमने पिछली बार 27 कोबरा की एक खेप को पकड़ा था, जिन्हें राजस्थान के मदारियों के एक परिवार द्वारा शहर में साँप के खेल दिखाने वालों को बेचने के लिए लाया जा रहा था। वे सभी एक ही थैले में थे और उनमें से सभी बुरी तरह से चोटिल थे। उनमें से आधे कुछ ही दिनों में मर गए थे। उनके खिलाफ मामला दर्ज किया जा चुका है, परंतु वह परिवार संभवतः गायब हो गया है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि वे शहर के किसी अन्य भाग में और साँपों को बेचेंगे। साँप के संकटापन्न होने का कारण ऐसे साँप के उपयोग करने वाले हैं। कल्पना कीजिए कि यदि उनकी संख्या केवल 5 हजार ही हो। पिछले कई वर्षों से प्रत्येक 6 सप्ताह में 5 हजार कोबरा (सामान्यतः इसके फन के कारण सँपेरे इसके पीछे पड़ते हैं) की हत्या की जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी हत्या की जाती है। किसी भी साँप को प्रजनन के लिए वापस जंगल में नहीं छोड़ा गया है। अधिकांश मदारी स्वयं साँप को नहीं पकड़ते हैं और उन्हें पता भी नहीं होता कि ऐसा कैसे किया जाता है। वे अपने स्टॉक के लिए अवैध शिकारियों की एक श्रृंखला पर निर्भर करते हैं। इसलिए उन्हें पता भी नहीं होता कि उनका साँप कहाँ से आया होगा। दूसरा, चूँकि किंग कोबरा के दाँतों में विष होता है, इसलिए अवैध शिकारी सबसे पहले एक हथौड़े से उसके दाँतों को तोड़ देते हैं।
कोबरा के विष वाले दाँत उसके कैनाइन दाँत होते हैं। कल्पना कीजिए कि आपके कैनाइन को हथौड़ी मारकर तोड़ा जाए। इस प्रक्रिया में कई साँपों के जबड़े टूट जाते हैं। इसमें दर्द काफी अधिक होता है और तोड़े जाने से होने वाला संक्रमण पूरे जबड़े में फैल जाता है, ठीक वैसे ही जैसा कि यह मानव में होता है। एक बार ये दाँत निकाल दिए जाने के पश्चात साँप खा नहीं सकते। इन दाँतों का मुख्य उद्देश्य लोगों को काटना नहीं है। ये भोजन को पचाने के लिए होते हैं। विष एक एन्जाइम है जो भोजन को सोखता है ताकि साँप का शरीर उसे पचा सके। ये दाँत न होने पर भोजन को पचाया नहीं जा सकता। यदि साँप को भोजन करना भी हो तो वह ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि उसका जबड़ा संक्रमित तथा टूटा हुआ है और भोजन उसके शरीर में बिना टूटे हुए चला जाएगा तथा कवच और अन्य रोग उत्पन्न करेगा। अवैध शिकारियों द्वारा दावा किए अनुसार उसके प्रजनन काल के दौरान उसे जंगल में ही वापस छोड़ दिए जाने पर भी उसकी मृत्यु हो जाएगी, क्योंकि वह भोजन नहीं कर सकता, वह प्रजनन नहीं कर सकता और जिस जंगल में उसे छोड़ा गया है वह उससे अपरिचित होता है। साँप कुछ दिन तक बिना भोजन किए रह सकता है। वह पतला तथा कमजोर होता जाता है। इसके साथ ही उसे गोल-गोल घुमाकर लपेटने की अमानवीय क्रूरता और एक ऐसी सिल्लियों से बनी सीधी टोकरी में रखना जिसकी खुली तीलियाँ उसे हमेशा चुभती रहें।
साँप एक लंबा रेंगने वाला प्राणी है। इसे निश्चित रूप से दिन में 20 घंटे के लिए जबरदस्ती मोड़कर रखे जाने की आदत नहीं होती।
अपने को उसकी स्थिति में रखकर देखिए और कल्पना कीजिए कि यदि आपके साथ ऐसा होता तो। इसकी त्वचा नरम तथा संवेदनशील होती है। इसमें आसानी से छेद हो जाते हैं। वस्तुत: आपके नाखून बढ़े हुए हों और आप किसी साँप को पकड़ लें तो आप आसानी से उसे इस प्रकार जख्मी कर सकते हैं कि उसकी मृत्यु हो जाए। न केवल सँपेरों के नाखून लंबे तथा गंदे और उनके हाथ सख्त होते हैं, बल्कि जिस टोकरी में उन्हें रखा जाता है वह भी साँप की त्वचा के लिए बहुत खतरनाक होती है। कोई भी साँप एक माह से अधिक जीवित नहीं रहता। फिर भूखा, सही प्रकार से नहीं रखे जाने, टूटे हुए जबड़े, जबड़े के संक्रमण, जबरदस्ती लपेटे जाने से पसलियों के टूटने से उसकी मृत्यु हो जाती है। वह फिर कभी जंगल में अपना घर नहीं देख पाएगा। चूँकि उसे पाँच सौ रुपए में खरीदा गया था और मदारी ने इससे कई हजार रुपए कमा लिए हैं, इसलिए उसके पास दूसरा साँप खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे हैं। अवैध शिकारियों ने माँग की है कि सरकार एक 'साँप पार्क' की स्थापना करे जिसमें उन सभी को रोजगार मिल सके। यह काम छोड़ चुके जेबकतरों के लिए एक प्रदर्शनी पार्क स्थापित करने के समान होगा ताकि वे जनता को अपने कौशल दिखा सकें। उस पार्क में केवल यही होगा कि इन लोगों को जाकर और अधिक साँप लाने की अनुमति होगी, उसके साथ वे वैसा ही व्यवहार करेंगे और उसे पर्यटकों के सामने दिखाने के लिए सरकार द्वारा उन्हें रुपए दिए जाएँगे। अभी की तरह दर्शकों को ढूँढने के लिए गलियों में घूमने के बजाय वे आसानी से काम करेंगे, सरकारी वेतन तथा सरकारी मकान लेंगे और अपने दर्शकों के आने की प्रतीक्षा करेंगे। उसमें ही साँपों को पहले जैसे ही तरीके से मारा जाएगा।
यदि वे आगे क्या करें इसके बारे में इतने चिंतित हैं तो मैं यह सुझाव देती हूँ कि उनकी सारी चिंताओं को दूर करने के लिए उन्हें तिहाड़ जेल अथवा आगरा की जेल में सरकारी मेहमान के रूप में रखकर कालीन बनाने के लिए कुछ पैसे दिए जा सकते हैं।
आगरा के एक लेखक ने इस पर दुःख व्यक्त किया है कि बीन लुप्त हो जाएगी। ये बिलकुल बकवास है। बीन एक संगीत वाद्य के रूप में ऐसे किसी भी व्यक्ति को सिखाई जा सकती है जो इसे सीखना चाहे। ऐसा नहीं है कि यह वाद्य यंत्र सिर्फ किसी पशु के साथ ही अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, जैसे कि सितार सिर्फ देवी सरस्वती के साथ ही नहीं जुड़ी हुई है।वहीं लेखक लिखता है कि मदारी सरकार के लिए उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि वे साँपों से विष को निकालकर साँप के विष वाले संस्थानों को विष की आपूर्ति कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश यह भी असत्य है, क्योंकि उन्हें साँप के विष वाले दाँतों में से विष निकालना आता तो वे उन्हें हथौड़े से नहीं तोड़ते। मैंने अभी तक कई हजारों साँपों को पकड़ा होगा, जिनमें से सभी के जबड़े टूटे हुए थे। सँपेरा शब्द इस विनाशक व्यापार को काफी लंबे समय तक किए जाने के लिए उत्तरदायी है। कोई भी साँप को मोहित नहीं कर सकता। वे बहरे होते हैं और उनको दिखाई भी कम ही देता है। वे इसलिए झूमते हैं क्योंकि वे एक ऐसी डंडी जो कि बीन होती है, के किनारे को देख सकते हैं जो खतरनाक तरीकों से उनकी ओर आ रही होती है और वे उसके प्रहार से बचना चाहते हैं। जो लोग साँपों को पकड़कर थैले में डालते हैं, उन्हें उनके सही नाम से बुलाया जाना चाहिए, जैसे साँप का उपयोग करने वाले अथवा अवैध शिकारी या भगवान विष्णु के सबसे प्रिय नागदेवता, शेषनाग के हत्यारे। manka